सोमवार, 24 मई 2021

Himachal में trekking करने से पहले जान लें ये नियम

बात अगर खूबसूरत वादियों वाले Himachal_Pradesh की हो तो दिमाग में एक ही बात आती है वो है घूमना। सैर-सपाटा कौन नहीं करना चाहता। कोई family के साथ बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच किसी cottage या resort में फुर्सत के पल बिताना चाहता है तो कोई biking या SUV लेकर हरी-भरी घाटियों के बीच घुमावदार और सुंदर सड़कों पर Long drive करना पसंद करता है। इनके बीच एक और कैटेगरी है वो है ट्रैकिंग करने वालों की....।

शहर की भीड़भाड़ से दूर, पहाड़ के घने जंगलों की पगड़डियों के बीच, मन में रोमांच को भरकर दूर तक चलना, बीच में रुक-रुक कर खूबसूरत वादियों को निहारना, कलकल करती नदियों के म्यूजिक में डूब जाना, जंगल का सन्नाटा तोड़ते झरनों में भीगना, पेड़ों के झुर्मुटों में अचानक किसी आहट को महसूस कर सिहर उठना और फिर रोमांच का डबल हो जाना, आसमान में अटखेलियां करते हुए पक्षियों को कैमरे में कैद करना और फिर पगडंडियों पर उतर आए बादलों के बीच खो जाना, कहीं refreshment और energy बटोरने के लिए रुक कर camping कर लेना और फिर किसी पहाड़ की चोटी को लक्ष्य बनाकर उसपर पहुंचकर विजय को महसूस कर अपनी ताकत और confidence पर इतराना....इन्हीं खूबसूरत पलों का नाम ही तो ट्रैकिंग है। कई लोग सोलो यानि अकेले trekking करना पसंद करते हैं तो कुछ groups में करते हैं। ट्रैकिंग को लेकर पिछले कुछ साल के दौरान युवाओं में craze बढ़ा है। अब युवा तो इसे करियर बनाकर बिजनेस तक कर रहे हैं तो कई लोगों में ये पैशन की जगह ले चुका है। ट्रैकिंग करने के लिए किसी जगह की पूरी जानकारी न हो तो ये adventure और thrill काफी काफी महंगा भी साबित हो जाता है। जंगल में भटकने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इस तरह के हादसे अक्सर सामने आते रहे हैं। फ्यूचर में इस तरह की कोई घटना न हो, इसके लिए हिमाचल प्रदेश में ट्रैकिंग करने वालों के लिए नया नियम आ गया है। अगर हिमाचल प्रदेश में ट्रैकिंग करना चाहते हैं तो अपने साथ GPS system रखना होगा। इससे ट्रैकिंग दल को आसानी से ढूंढा जा सकेगा। यदि कोई ट्रैकर एक दिन से ज्यादा समय के लिए ट्रैकिंग करने, camp लगाना, tent लगाना चाहता है तो वन विभाग से इसकी मंजूरी लेनी होगी। ट्रैकिंग का समय सुबह सात से शाम सात बजे तक होगा। जाने से पहले और आने के बाद नजदीकी पुलिस थाने या चौकी में जानकारी देनी जरूरी होगी। 

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साभार 
इस स्टोरी को लिखना, विश्व की सबसे ऊंची चोटी Mt. Everest फतेह कर चुकी Mamta Sodha के सहयोग के बिना संभव नहीं था। सुश्री ममता ने साल 2010 में माउंट एवरेस्ट फतेह किया था और इस समय हरियाणा पुलिस को सेवाएं दे रही हैं। उनका विशेष धन्यवाद...। साथ ही अरविंद बिश्रोई का भी आभार..। अरविंद पेशे से चंडीगढ़ में पत्रकार हैं और ट्रैकिंग के प्रति काफी संजीदा हैं। 

सोमवार, 15 मार्च 2021

मोरनी में पूरी होगी सपनों की उड़ान--हरियाणा के एकमात्र हिल स्टेशन में पैराग्लाइडिंग शुरु करने की योजना पर चल रहा है विचार

परिंदों की तरह आसमान में दूर तक उड़ान भरने का ख्वाब कौन नही रखता। हर कोई ऐसा चाहता है। अगर आपका ये सपना पूरा होने जा रहा हो तो ये तय है आप खुद को ऐसा करने से रोक नही पाएंगे! ये सपना पूरा हो सकता है। बशर्ते योजना अगर हरियाणा सरकार अगर चाहे तो आप पैराग्लाइडिंग कर इस सपने को पूरा कर पाएंगे। आपको ये सुन कर यकीन नही हो रहा तो वीडियो को ध्यान से देखिए। म ोरनी हरियाणा का एक मात्र हिल स्टेशन है। ये जगह अब तक टूरिज्म के मामले में हाशिये पर छिटका हुआ नजर आती थी। मोरनी जिसकी पहचान अब तक बुनियादी रूप से पिछड़े हुए इलाके के तौर पर ही बनी हुई थी। मोरनी का ये हाल तब है जब ये हरियाणा-पंजाब की संयुक्त राजधानी चंडीगढ़ से महज कुछ ही दूरी पर है। पंचकूला जिले में पड़ने वाले इसी मोरनी का आसमान अब आपका स्वागत बाहें फैलाने को तैयार हो रहा है। दरअसल मोरनी में सैलानियों को पैराग्लाइडिंग करवाने की एक योजना पर काम शुरू हो चुका है। इसके लिए सर्वे तक हो चुका है और ये जगह पैराग्लाइडिंग के लिए बिल्कुल उपयुक्त पाई गई है। सर्वे करवाने वाले हरियाणा शिवालिक विकास बोर्ड की माने तो ये जगह पैराग्लाइडिंग के लिए वर्ल्ड की नंबर 2 साइट बीड़-बिलिंग (हिमाचल प्रदेश) से कहीं भी उन्नीस नही है। पैराग्लाइडिंग के शौकीन जानते हैं कि पैराग्लाइडिंग यूं तो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत अन्य राज्यों में कई जगह होती है लेकिन कांगड़ा जिले में बीड-बिलिंग की पैराग्लाइडिंग साइट इस समय देश मे नंबर वन है। अब इसकी तुलना मोरनी से हो तो बात तो बड़ी है और इसपर चर्चा भी होगी। मोरनी में पैराग्लाइडिंग की साइट तलाश ली गई है। ये साइट मोरनी हिल स्टेशन ने कोई चार किलोमीटर पहले है। इसका लॉन्चिंग पैड से लेकर लैंडिंग की जगह का बारीकी से मुआयना शिवालिक विकास बोर्ड और बीएसएफ की टीम कर चुकी है। टीम ने इलाके में कुछ और जगह भी ऐसी पता कि जहां पैराग्लाइडिंग शुरू की जा सकती है। इसमें हरियाणा की सबसे ऊंची चोटी करोह पीक का नाम विशेष रूप से जुड़ रहा है।
मोरनी में पैराग्लाइडिंग शुरु करने की संभावनाओं पर हरियाणा शिवालिक विकास बोर्ड के एक्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन महेश सिंगला ने बताया कि "यहां टैंडम पैराग्लाइडिंग की अपार संभावनाएं हैं। इलाके में कुछ और जगह देखी गई हैं जहां इसे शुरु किया जा सकता है। इस संबंध में उन्होंने अपनी रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है।" कुल मिलाकर अब गेंद हरियाणा सरकार के पाले में है। ये योजना अगर सिरे चढ़ी तो दिल्ली या उससे आगे के लोगो को पैराग्लाइडिंग का शौक पूरा करने के लिए न केवल एक और साइट मिल जाएगी बल्कि इस इलाके के भी अच्छे दिन आ जाएंगे। यहां न केवल टूरिज्म बढेगा बल्कि रोजगार भी बढ़ेगा। रही बात सैलानियों की तो शिवालिक विकास बोर्ड तो यहां और दूसरी एडवेंचर स्पोर्ट्स के भी शुरू होने की प्लानिंग तैयार करे बैठा है। बॉक्स खूबसूरत जगह है मोरनी जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है कि मोरनी एक खूबसूरत जगह है। ये पंचकूला जिले में है और चंडीगढ़ से भी ज्यादा दूर नहीं है। यह इलाका एकदम शांत है और छोटे-छोटे गांव हैं। यह इलाका मानसून और सर्दी के दौरान काफी खूबसूरत हो जाता है। बारिश के दौरान यहां के पहाड़ों की हरियाली देखते ही बनती है। यहां पूरे साल मौसम आमतौर पर साफ रहता है लेकिन, बारिश के दिनों में बादलों की टोली जंगलों और पहाड़ों में घूमने चली आती है। इस इलाके में प्रकृति प्रेमियों के लिए बहुत कुछ है। उदाहरण के तौर पर यहां बेरवाला बर्ड सफारी है जहां पक्षियों की सौ से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। माइग्रेटरी बर्ड भी यहां आते रहते हैं। इसके अलावा यह इलाका जंगली जानवरों का घर भी है। ये बर्ड वॉचर्स, क्रिएटिव फोटोग्राफरों, साइक्लिस्टों और ट्रैकिंग के शौकीन यहां आते हैं। बावजूद इसके, हैरानी बाली बात यह है कि मोरनी फिर भी लोकप्रिय नहीं हो पाया। शायद इसका कारण पगल में खूबसूरत राज्य हिमाचल प्रदेश है जहां सैलानी सीधे चले जाते हैं और मोरनी पर्यटकों के इंतजार में पीछे खड़ी रह जाती है। इस वजह से ये इलाका खूबसूरत होकर भी टूरिज्म के नक्शे पर वो जगह नहीं बना पाया, जिसका ये हकदार है। इस इलाके में देसी इलाज में काम आने वाली असंख्य जड़ी-बूटियों की भंडार है। फिर भी ये इलाका पिछड़ा हुआ नजर आता है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि लोगों की नजरों से दूर होने के कारण इसकी प्राकृतिक खूबसूरती अभी तक बरकरार है। मोरनी कोरोना के दौरान उस समय लोगों की नजरों में आया था जब देशभर में अनलॉक डाऊन के बावजूद दूसरे पहाड़ी राज्यों ने अपने दरवाजे बंद रखे हुए तो उस दौरान मोरनी ही खुला हुआ था और सैलानियों, बाइकर्स, राइडर्स भारी संख्या में इलाके में नजर आने लगे थे। #morni #mornihills #paragliding #tandemparagliding #panchkula #chandigarh #offbeat_destination #Haryanagovernment #haryanatourism

बुधवार, 27 जनवरी 2021


फ्लैशबैक की रोड पर एक सफर

  


ऋषिकेश का प्रोग्राम अचानक बना। तैयारी भी हुई उसी तरह झटपट। चूंकि सर्दी वाले दिसंबर (2020) का महीना था तो ऋषिकेश इलाके में अगले कुछ दिनों के मौसम का अनुमान गूगल बाबा के आशीर्वाद से पता कर उसी हिसाब से कपड़े भी पैक कर लिए। मन में सबसे बड़ी उत्सुकता यह थी कि कोरोनाकाल में लंबे समय तक घर में रहने के बाद पहली बार कहीं बाहर निकलना हो रहा था लेकिन, जहन में खुद को कोरोना से बचाए रखने की चुनौती भी थी।
बहरहाल, इस टूर के लिए सुबह-सुबह निकलना था तो मौजूदा मौसम के दौरान सफर में कोहरे की आशंका ने भी सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी फेर में अचानक बचपन में स्कूल की तरफ से ऋषिकेश की पिकनिक की स्मृतियां भी किसी कोहरे भरे धुंधलके में हल्की-हल्की नज़र आने लगीं। 
पक्की तरह से याद नही पर शायद मैं चौथी या पांचवी क्लास में पड़ते हुए ऐसी ही सर्दी वाले दिनों में पहली बार ऋषिकेश गया था। एक दम से जेहन में खुद को स्कूली ड्रेस में क्लासमेट्स के साथ ऋषिकेश की मुनि की रेती पर गंगा मैया के किनारे बैठे पाया। ..और हाँ, दूर से लछ्मण झूले का चित्र भी खिंच गया। स्मृति में खो जाने पर तमाम दूसरे चित्र भी उभर आए। चेहरे पर असली मुस्कुराहट तो स्कूली पिकनिक के उस क्रेज को याद कर आ गई कि, स्कूल तो गया था पर पहली बार बिना भारी बैग उठाए, क्लास से भी छुटकारा तो टीचर की तरेरती आंखों से भी निजात मिल गई थी। दूसरा क्रेज़ तो टिफ़िन में ही भरा हुआ था, जिसे मां ने सुबह ही तैयार कर कुछ हिदायतों के साथ मुझे और मेरे बैग को सर्दी के हिसाब से पैक कर दिया था कि कब क्या खाना है, क्या करना है। मुझे आज भी याद है कि तब टिफिन में आलू की सब्जी, पूरी और अचार, वॉटर बॉटल, ड्राईफ्रूट के नाम पर मूंगफली, टाइम पास के लिए पार्ले जी के बिस्कुट के पैकेट, टॉफियां, एक मिल्क बॉटल, संतरे, सेब और केले ही थे। उस दौर के स्कूल टिफिन आज की तरह पास्ता, बैंबिनो, पिज्जा या फ्रोजन फूड से भरे नहीं होते थे। उस दौर के टिफिन का अलग ही देसीऔर घरेलू स्वाद हुआ करता था। मुझे आज भी याद है कि उस दिन में मां के नींद से उठाने से पहले ही न केवल जाग गया था बल्कि बिना किसी नानुकुर के नहां भी लिया था। यह भी याद है तब मां ने मुझे तब एक की जगह दो स्वेटर, कोट, पैंट और यहां तक कि डबल जोड़ी जुराब तक पहनाई थी।
बहरहाल, तब और आज दिसंबर 2020 में ऋषिकेश की यात्रा में समानता केवल यही थी कि इस बार भी न केवल मां की हिदायतें बदस्तूर बरकरार थी बल्कि माँ खुद भी हरिद्वार तक साथ जा रही थीं। 
पूरे रास्ते मेरे दिमाग मे यही बात घूमती रही कि आज इतने साल बाद भी ऋषिकेश क्या वैसा ही होगा जिसके धुंधले चित्र अवचेतन में रचे-बसे हैं!! या क्या ऋषिकेश का मूल स्वरूप भी मौजूदा आधुनिक युग में विकास की अंधी और कृत्रिम दौड़ में पूरी तरह बदलते हुए कहीं खो गया होगा।

अपनी इस आशंका को लिए उधेड़बुन करता हुआ मैंने चंडीगढ़ से सफर शुरु कर दिया। मेरे साथ मां के अलावा मेरे के दोस्त कुलदीप भी थे। ऋषिकेश को लेकर मेरी यह आशंका उस समय और बढ़ गई जब मेरी गाड़ी चंडीगढ़ से देहरादून के लिए बने नए हाई स्पीड हाईवे पर सरपट दौड़ने लगी। इसका कारण यह था कि इस रूट पर पहले में यमुनानगर (हरियाणा) व सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) तक आता-जाता था जो इस बार इस हाईवे नुमा बाईपास में कहीं पीछे छूट गए। यह वही सहारनपुर है जहां से मैं बचपन मे उत्सुक मन लिए पहली बार ऋषिकेश गया था। खैर...नॉन स्टॉप हाईवे की स्पीड की तरह जेहन में कई विचार आये तो आज के ऋषिकेश की पवित्र नगरी को छूने की उत्सुकता भी परवान लेती चली गयी। 

 

                                     👆 (Panchkula-Dehradoon Highway)👆

 सहारनपुर को बाईपास कर कुछ दूरी पर भावनात्मक संबंधों वाले छोटे से कब्बे गागलहेड़ी की तरफ डायवर्सन दिखा तो मन को बहुत खुशी हुई। यह जंक्शन वास्तव में मेरी भावनाओं से जुड़ा है। यहां से एक तरफ मेरे नाना के देहरादून की तरफ रास्ता जाता है तो दूसरा मेरी ससुराल रुड़की की तरफ के लिए भी शॉर्टकट है। मन में अतीत की कुछ यादें लिए मैं आगे बढ़ा तो पता चला कि यह डायवर्सन तो छुटमलपुर की जगह मुजफ्फरनगर की तरफ सड़क से लिंक है। मै थोड़ा चकराया और पूछते-पूछते गागलहेड़ी से पहले भगवानपुर को जाने वाली रोड पर आ गया। इस जगह पहुंचते ही मां ने बताया कि यहां के उबले सिंघघाड़े बहुत मशहूर हैं और जब भी हम तेरे नाना के पास देहरादून जाते थे तो खूब सारे सिंघाड़े खरीद लेते थे।

मै उस समय माँ की इच्छा को शायद इस लिए नही समझ पाया कि आगे कोहरा बढ़ने से पहले हरिद्वार तक पहुचने की जल्दी थी। कुछ ही देर में मै उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड की सीमा पर पहुच गया। यहां चेकिंग चल रही थी। मेरे साथ मौजूद कुलदीप ने बताया कि महाकुम्भ की तैयारी चल रही है। ये सुनते ही कार में पीछे बैठी माँ ने महाकुम्भ के आयोजन और इसके पौराणिक महत्व पर विस्तार से बताया। इस महत्वपूर्ण जानकारियों को सुनते-सुनते हम भगवानपुर पहुंच गए।
भगवानपुर भी एक तरह से इस इलाके का जंक्शन पॉइंट है तो यहां भीड़ होना भी स्वाभाविक था। इन दिनों इस रोड पर भी रुड़की तक हाईवे चौड़ा हो रहा है और फ्लाईओवर तो कस्बे के बीच ही आ चुका तो इस कारण यहां से निकलने में देरी लगी। तब एहसास हुआ की पुराने दौर में एक जगह से दूसरी जगह जाने में किस तरह कीमती घण्टे खराब होते होंगे। इस लिए खुद को आज के दौर वाले नॉन स्टॉप हाईवे और तेज स्पीड वाले इंटरनेट युग में पाकर खुशनसीब सा भी लगा। बातों-बातों में मैं रुड़की की तरफ जाने की बजाए मशहूर धार्मिक स्थल पिरान कलियर शरीफ़ के पास से गुजरने वाली लिंक रोड पर पहुंच गया। ये सिंगल रोड था पर रुड़की रोड पर चल रहे रोड के काम को देखते हुए सही और कम भीड़ वाला था। इस तरह मैं हरिद्वार के आउटर पर पहुंच गया। इस पूरी सड़क पर मुझे एक बात अच्छी यह लगी कि मोटरसाइकिल या स्कूटर चला रहे लोगो ने हेलमेट पहने हुए थे। सुकून मिला कि जीवन की कीमत को सड़कों पर संजीदगी से लिया जाने लगा है। अलबत्ता दुख इस बात का जरूर हुआ कि कोरोना से चल रही जंग को लोग अब गंभीरता से नही ले रहे हैं बल्कि यहां के लोगों की डिक्शनरी में जैसे सोशल डिस्टेंसिंग तो जैसे कोई शब्द ही नहीं है। 
बहरहाल, हरिद्वार पहुचते ही मैंने दोबारा गूगल बाबा के चरण पकड़ लिए और गूगल मैप के सहारे आगे बढ़ता रहा लेकिन, कुछ देर बाद लगा कि गूगल बाबा हरिद्वार में कुम्भ की तैयारियों को लेकर बन रहे फ़्लाईओवर और सड़कों के मकड़जाल में उलझ से गए हैं। फिर एक पक्के भारतीय नागरिक की तरह परंपरागत जुगाड़ लगाया और पहुंच गए चौक पर एक पनवाड़ी की छत्रछाया में। उनसे गन्तव्य का पता किया। माँ को एडजस्ट किया, उनका सामान रखा और चाय के दौरान उनकी हिदयातों का लंबा लैक्चर की घुट्टी लेकर मैं और कुलदीप ऋषिकेश की तरफ निकल गए। 
 
 (👆Visual shot of Ganga river Rishikesh) 
 
ऋषिकेश की हरिद्वार से दूरी कोई लगभग 28 किलोमीटर होगीं लेकिन, लगातार गहरी होती शाम और पूरे रास्ते मे सड़क पर डायवर्सन और उसपर भारी ट्रैफिक के कारण कोई 2 घण्टे में हम ऋषिकेश के मशहूर नटराज चौक पहुंच गए। इस चौराहे पर सड़क किनारे लगे साइन बोर्डों ने मेरे घुमक्कड़ मन को बहुत ज्यादा लालायित कर दिया। एक तरफ हरिद्वार का रास्ता, जिससे हम आये थे, दूसरी तरफ देहरादून, खूबसूरत धनोल्टी और मसूरी तो तीसरी तरफ देवप्रायग व बद्रीनाथ तो चौथा ऋषिकेश शहर को रास्ता जा रहा था। हमने अर्जुन के लक्ष्य की तरह सीधे ऋषिकेश की धरती को चूम लिया। 
 
(👆Voice-over at Natraj Chowk-Rishikesh)
 
चूंकि रात के कोई साढ़े नौ बज चुके थे और पहाड़ों में जैसे यह वक्त आधी रात सा लगता है तो हमने सबसे पहले नटराज चौक पर एक रेस्टोरेंट से खाना पैक करवाया और होटल पहुंच गए। इस होटल की बुकिंग यहीं रहने वाले युवा व उर्जावान आशीष लखेड़ा ने की हुई थी। हमने खाना खाया और अगले दिन की प्लानिंग करते हुए सो गए।

अब अगली क़िस्त में बचपन में देखे ऋषिकेश बनाम आज के दौर के ऋषिकेश की अगली कड़ी जल्द होगी सामने.......
 
 
 

 

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शनिवार, 1 नवंबर 2008

मेरी मुराद पूरी, तुम्हारे मंसूबे पूरे

चुनाव का सीजन शुरु होने को है। सीजन इस लिए कहा क्योंकि किसी व्यापारी की तरह राजनेता भी अपने बिजनेस को लेकर उम्मीद लगाते हैं कि इस बार फसल (वोट) अच्छी कटेगी क्योंकि उन्होंने दिन-रात एक कर कभी धिक्कार रैली तो कभी बदलाव रैली तो कभी विजय संकल्प रैली, विकास रैली आदि एतिहासिक रैलियां कर जो विरोधियों को अपनी मांद में घुसने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह उठता है कि रैलियां और उनको दिए जाने वाले नाम अथवा इन रैलियों में गला फाड़-फाड़ कर दोहराए जाने वाले नारे और संकल्पों का भीड़ पर क्या प्रभाव पड़ता है। जनता इन रैलियों को रैले की शक्ल इस उम्मीद से देती है शायद नेतागण उनके दुख महसूस करते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि सभी राजनेता संवेदनहीन नहीं हैं। कुछ वाकई में आम जनता के लिए सोचते भी होंगे। लेकिन, मौजूदा राजनीति का कड़वा सच यही है कि चुनाव के सीजन में रैलियों का असल मकसद अपने दल के अनुरूप माहौल तैयार करने का होता है। मुद्दे भी वही उठाए जाते हैं कि भोला मतदाता उनकी रौ में बह जाए। वह इस रौ में बहेगा तभी तो किसी को धिक्कारेगा या कोई संकल्प लेगा अथवा परिवतॆन की कसम खाएगा। यदि कसम खरी उतर गई तो उसकी जहां मुराद पूरी होगी वहीं राजनेताओं के मंसूबे भी पूरे हो जाएंगे।

शनिवार, 23 अगस्त 2008

आसमान में इमारतें और जमीन का सच

कत्रिम लेकिन तेज विकास की रफ्तार से आसपास की दुनिया बदल रही है। जमीन के बल पर खड़ी बहुमंजिला इमारतें अब आसमान में नजर आती हैं। यह काम और कोई नहीं बल्कि मजदूर करता है। यह तबका आज भी जमीन पर रहता है, इससे जुड़ा है। दिनभर की ढुलाई और पसीने से तरबतर यह थका सा मजदूर किसी अधॆविकसित इमारत में शाम ढले लालटेन की बुझी सी रोशनी में अपनी थाली तैयार करता है। इस समय उसकी कल्पनाएं खीर, पूरी, सब्जी-दाल और चावल से सजती होंगी लेकिन वास्तव में थाली में एक अदद मिचॆ, हाथ से तोड़ा गया प्याज और मोटी रोटी होती है। वो इसे शौक से खाता है। दिनभर की कमाई के थोड़े से हिस्से से यदाकदा वह किसी भोजपुरी फिल्म का लुत्फ भी उठा लेता है। सिनेमा हाल से निकलने वाली रिक्शा और ठेलों की भीड़, आज के उन मल्टीपलेक्स, शॉपिंग मॉल से टक्कर तो लेती है, जिन्हें वास्तव में इन्होंने ही आसमान पर पहुंचाया है। वे पिजा या सिज्लर तो नहीं लेकिन ठेलों पर रसीली जलेबी का स्वाद लेकर अपने भीतर के रसबोध का भी अससास करवाते हैं। इधर, हम हैं कि मल्टीस्टोरी बिल्डिंग की छत से हमें नीचे की दुनिया बहुत छोटी नजर आती है। सब कीड़े प्रतीत होते हैं। जमीन तो दिखती है पर उसकी सच्चाई नहीं देख पाते। कुल मिलाकर हम असली भारत और उसको आधुनिक बना रहे असली भारतीयों की तरफ ध्यान ही नहीं देते। आदतन हमसब आसमान की ओर देखकर ही चलते हैं और ठोकर खाते हैं।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

खेल तो अब होगा शुरू, राजनीति के खिलाड़ी हैं तैयार....

खेल के इतिहास में पहली बार तीन पदक मिलने पर हर भारतीय की तरह मुझे भी गवॆ है। अब पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को सिर-आंख पर बैठाया जाएगा। हर भारतीय की तरह मैं भी भीतर से गुरूर से भर जाऊंगा। मुझे भी नाज होगा अपने भारतीय होने पर। पर सामानांतर रूप से चलने वाली एक और लकीर भी पीड़ा देती रहेगी। वह है, खेल में मिली ताजातरीन उपलब्धियों पर श्रेय लेने की राजनीति की। राजनीति की दुनिया में तो खेल अब शुरु होगा और विषय होगा बीजिंग के मेडल। देखते रहिए, राजनीति के खिलाड़ी कब किस पर कैसा निशाना या पंच मार कर किसे घायल करते हैं और खुद को विजेता घोषित करते हैं। राजनीति का ओलंपिक मैदान तो अब सियासतदांन तय करेंगे कि उनमें से कौन अभिवन बिंद्रा या विजेन्द्र है। खैर.......... रहना तो यहीं हैं तो झेलना भी है इस गलीच राजनीति को।

सोमवार, 18 अगस्त 2008

मेडल के बहाने

ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा का गोल्ड और अब जितेंद्र, विजेंद्र और अखिल कुमार के कारण बॉक्सिंग को लेकर बढ़ी लोकप्रियता से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अब कम से कम देश में खेल के नीति बनाने वाले खेल को बढ़ावा देने के लिए कुछ खास करेंगे। हमारे देश से कई खिलाड़ी बीजिंग गए। कुछ आगे बढ़े लेकिन कड़ी टक्कर में वे पिछड़ गए। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने बेहतरीन प्रयास न किए हों, लेकिन खेल में आखिर सबसे ताकतवर को तो जीतना ही था। यह संयोग है कि शूटिंग और बॉक्सिंग में उल्लेखनीय प्रदशॆन करने वाले खिलाड़ी उस पंजाब और हरियाणा राज्यों से हैं जो अतीत में भाई थे। संयुक्त महापंजाब से विभाजित कर हरियाणा अलग राज्य बना था। यही वो दोनों राज्य हैं जो खाद्यान से देशभर का पेट भरते आए हैं। साफ है कि दोनों राज्यों के मेहनतकश नागरिक हर फील्ड में नाम कमाते आए हैं। चाहे वह सेना को सेवाएं देने का मामला हो या फिर देश-विदेश में इंजीनियरिंग, डाक्टरी आदि पेशे। यही वजह है कि पंजाब अब केवल पंजाब न होकर ग्लोबल पंजाब के नाम से पहचाना जाता है। हर मैदान में पंजाब और हरियाणा के लोगों ने अपने को साबित किया है। पंजाबियों को जहां क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्दू, युवराज सिंह, हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह आदि पर नाज है तो हरियाणा को कपिल देव, चेतन शमा, जोगिंद्र शमाॆ आदि पर नाज है। बीजिंग में भिवानी के छोरों के मुक्कों की आवाज देश में खेल के प्रति उदासीन रहने वालों के कानों में भी गूंजनी चाहिए, तभी जाकर भविष्य में कुछ और अभिनव पैदा होंगे।