बुधवार, 18 जून 2008

मीडिया बना स्वयम्भू ठेकेदार

अब वह वक्त आ गया है जब किसी अपराध के लिए पीड़ित लोग पुलिस और सीबीआई की जांच के बजाय मांग करेंगे कि मामला मीडिया ख़ास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सुपुर्द कर दिया जाए। इसके दो लाभ होंगे। पहले तो टीवी चैनल जम कर ट्रायल कम इन्कुआरी करेंगे। आउट पुट और इन पुट दोनों का काम बढेगा, काम बढेगा तो उन्हें भारी भरकम लिफाफा हर माह पकडा देने वाला मालिक बड़ा खुश होगा। एंकर को तब परदे पर ज्यादा चीखना-चिल्लाना पड़ेगा। अभी तक किसी अपराध के लिए रिपोर्टिंग करने में कई फिल्ड संवाददाताओं को घटना स्थल, सीबीआई दफ्तर, पुलिस प्रमुख ऑफिस या अस्पताल आदि-आदि ठिकानो पर खड़ा होना पड़ता है। नई व्यवस्था में इक फील्ड रिपोर्टर की कमी हो सकेगी, तब सीबीआई मुख्यालाय या पुलिस ऑफिस के सामने संवाददाताओं की जरूरत नही होगी। जांच का काम जब स्टूडियो में हे संपन्न होगा तो फिर अतरिक्त संवाददाता की क्या जरूरत?
अभी channels कई प्रकार के मामलो मे बातचीत के लिए कुछ ख़ास लोगो को बुलाते हैं। जिन्हें वे एक्सपर्ट कहते हैं। वे खूब बोलते हैं। ऐसे लोगो को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भाषा में "जुबान छेत्तू " कहा जाता है, यानी जुबान पीटने वाले। वे अधिकतर चेनल के एंकर से सहमत होते सुने औरदेखे जाते हैं। अगर कोई जुबान छेत्तू चेनल और एंकर की तयशुदा पॉलिसी से ज्यादा ही इधर-उधर होता है तो उसका नाम पैनल से हटा दिया जाता है। इस लिए कोई बिरला ही जुबान छेतू दाएं-बाएँ होता है। बंदी-बंधाई लीक पर बोलने का मतलब होता है कि पत्रम-पुष्पम से इक अदद "ठीक-ठाक" कवालिटी की स्कॉच की इक बोतल खरीदी जा सकती है।
अपराध की मीडिया ट्रायल का इक बहुत बड़ा लाभ है जो अपने महान अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री को भी भा जायेगा। तब अदालतों की जरूरत नही होगी। मीडिया ट्रायल कर लेगा और फैसला भी दे देगा। अदालतों मे जो करोडो रुपया रोजाना खर्च होता है वो देश हित मे बचेगा। फ़ैसला मीडिया दो प्रकार से तय करेगा। इक अपने स्टूडियो मे अनगिनत शेखर सुमंनो, नवजोत सिधुओं, मंदिराओं को जज के रूप मे बैठायेगा। लेकिन मामला तय करेगी जनता जो पक्ष-विपक्ष में चेनल को एस एम् एस भेजेगी। नोट करिये मोबाइल कंपनियों को कितना लाभ होगा!
लेकिन इक दिक्कत है, जनता अभी राज्य पुलिस मे अविश्वास जता कर सीबीआई से जांच की मांग करती है। सीबीआई तो इक है। लेकिन चेनल तो टोकरी भर हो गए हैं। तब समस्या होगी कि ट्रायल कौन सा चैनल करे? इसके लिए सुझाव पेश है कि मंदी मे नीलामी हो। जांच की मांग करने वाला पक्ष बोली लगाये, चॅनल अपने biknay की कीमत (रिज़र्व) तय करे। बोली ऊपर नीचे होते-होते कही न कही तय हो ही जायेगी।
मंदी मे चेनलों के स्तर (टी आर पी तक) होंगे। बड़े तेज़ और बेहद चालू चैनल से ट्रायल करवाने के लिए अमीर पार्टियाँ बोली देंगी। फिर आयेंगे मध्यम वर्ग के लिए मध्यं गति दशा वाले कम कीमत वाले चैनल। वे चैनल जो टीवी केबल से घरों तक पहुचते हैं। यह बेहद सस्ता होगा, ट्रायल और फ़ैसला भी उसी स्तर के अनुसार होगा। झुग्गी-झोपडी, स्लम वालो को मीडिया ट्रायल सुविधा का लाभ नही मिल सकेगा। उसके लिए रोहतक पुलिस के दो रंगरूट ही काफ़ी होंगे।
झुग्गी वालों को भे इक दिन चैनल- ट्रायल की सुविधा मिलेगी यह तब होगा जब कोई राजनितिक दल सत्ता हासिल करने के लिए कोई अन्य मुद्दा हाथ मे न होने पर इसका वायेदा जनता से कर देगा। अगर सत्ता मे आ गया तो पहले पार्टी मे कमेटी, फिर मंत्रिमंडल में सब कमेटी बना दी जायेगी। वर्षों तक संसद मे तय होगा की पास करे या फिर प्रवर समिति के ठंडे बस्ते में रख दें। इसलिए फिलहाल तो झोपड़-पट्टी वासिओं के लिए पुलिस ही विकल्प होगी।
ट्रायल की इस प्रस्तावित योजना में हम प्रिंट मीडिया को भूले जा रहे हैं। प्रिंट मीडिया भे मंदी माय इक हिस्सा होगा। उसकी दूकान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से छोटी होगी। लेकिन मंत्री से संत्री तक प्रिंट धारीओं की महेत्व समझते हैं। माना जाता है कि प्रिंट जल्दी ही सस्ते में फिक्स हो जाता है। प्रिंट की दहशत कम नही हुई है पर उसके रेट कम है। प्रिंट में अभी बहुतेरे एइसे "सिरफिरे " मोजूद हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के ऐसा ट्रायल शुरू कर देंगे। वे समाज-सेवा या अधिकारों के प्रति जागरूकता का लेबल चस्पा कर ऐसा करते हैं। इस पुनीत समाज सेवा के पीछे जिला या तहसील स्तर पर उनकी पुलिस कप्तान, जिलाधिकारी आदि से कोई पुरानी लाग-डाट भी हो सकती है। पर पीड़ित या बचाव पक्ष को इससे क्या लेना-देना! प्रिंट को हर मामलों माय इलेक्ट्रॉनिक की अपेक्षा किसी भी घटना या हादसों पर "फ्री एक्सपर्ट " मिल जाते हैं, क्यो कि वो "छपास रोगी " जो होते हैं।

शनिवार, 7 जून 2008

जीवन शैली के पुरातन अंदाज़ पर नया नजरिया

अमर उजाला चंडीगढ़ के युवा सम्पादक श्री प्रमोद भारद्वाज ने पत्रकारिता जगत की गंभीर और बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी संवेदनशीलता को साझा करने के लिये पीछे लौटें नाम से एक गंभीर ब्लॉग का प्रारंभ किया है।श्री प्रमोद जी के अनुसार इस ब्लॉग में तेज गाम जिंदगी के उन पहलुओं पर गंभीर चिंतन होगा, जिनकी असल जिंदगी में कोई ज़रूरत ही नही है।वे बताएँगे के जिंदगी दौड़ते हुए आगे जाने में है या पीछे लौटने में।