शनिवार, 1 नवंबर 2008

मेरी मुराद पूरी, तुम्हारे मंसूबे पूरे

चुनाव का सीजन शुरु होने को है। सीजन इस लिए कहा क्योंकि किसी व्यापारी की तरह राजनेता भी अपने बिजनेस को लेकर उम्मीद लगाते हैं कि इस बार फसल (वोट) अच्छी कटेगी क्योंकि उन्होंने दिन-रात एक कर कभी धिक्कार रैली तो कभी बदलाव रैली तो कभी विजय संकल्प रैली, विकास रैली आदि एतिहासिक रैलियां कर जो विरोधियों को अपनी मांद में घुसने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह उठता है कि रैलियां और उनको दिए जाने वाले नाम अथवा इन रैलियों में गला फाड़-फाड़ कर दोहराए जाने वाले नारे और संकल्पों का भीड़ पर क्या प्रभाव पड़ता है। जनता इन रैलियों को रैले की शक्ल इस उम्मीद से देती है शायद नेतागण उनके दुख महसूस करते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि सभी राजनेता संवेदनहीन नहीं हैं। कुछ वाकई में आम जनता के लिए सोचते भी होंगे। लेकिन, मौजूदा राजनीति का कड़वा सच यही है कि चुनाव के सीजन में रैलियों का असल मकसद अपने दल के अनुरूप माहौल तैयार करने का होता है। मुद्दे भी वही उठाए जाते हैं कि भोला मतदाता उनकी रौ में बह जाए। वह इस रौ में बहेगा तभी तो किसी को धिक्कारेगा या कोई संकल्प लेगा अथवा परिवतॆन की कसम खाएगा। यदि कसम खरी उतर गई तो उसकी जहां मुराद पूरी होगी वहीं राजनेताओं के मंसूबे भी पूरे हो जाएंगे।