शनिवार, 23 अगस्त 2008

आसमान में इमारतें और जमीन का सच

कत्रिम लेकिन तेज विकास की रफ्तार से आसपास की दुनिया बदल रही है। जमीन के बल पर खड़ी बहुमंजिला इमारतें अब आसमान में नजर आती हैं। यह काम और कोई नहीं बल्कि मजदूर करता है। यह तबका आज भी जमीन पर रहता है, इससे जुड़ा है। दिनभर की ढुलाई और पसीने से तरबतर यह थका सा मजदूर किसी अधॆविकसित इमारत में शाम ढले लालटेन की बुझी सी रोशनी में अपनी थाली तैयार करता है। इस समय उसकी कल्पनाएं खीर, पूरी, सब्जी-दाल और चावल से सजती होंगी लेकिन वास्तव में थाली में एक अदद मिचॆ, हाथ से तोड़ा गया प्याज और मोटी रोटी होती है। वो इसे शौक से खाता है। दिनभर की कमाई के थोड़े से हिस्से से यदाकदा वह किसी भोजपुरी फिल्म का लुत्फ भी उठा लेता है। सिनेमा हाल से निकलने वाली रिक्शा और ठेलों की भीड़, आज के उन मल्टीपलेक्स, शॉपिंग मॉल से टक्कर तो लेती है, जिन्हें वास्तव में इन्होंने ही आसमान पर पहुंचाया है। वे पिजा या सिज्लर तो नहीं लेकिन ठेलों पर रसीली जलेबी का स्वाद लेकर अपने भीतर के रसबोध का भी अससास करवाते हैं। इधर, हम हैं कि मल्टीस्टोरी बिल्डिंग की छत से हमें नीचे की दुनिया बहुत छोटी नजर आती है। सब कीड़े प्रतीत होते हैं। जमीन तो दिखती है पर उसकी सच्चाई नहीं देख पाते। कुल मिलाकर हम असली भारत और उसको आधुनिक बना रहे असली भारतीयों की तरफ ध्यान ही नहीं देते। आदतन हमसब आसमान की ओर देखकर ही चलते हैं और ठोकर खाते हैं।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

खेल तो अब होगा शुरू, राजनीति के खिलाड़ी हैं तैयार....

खेल के इतिहास में पहली बार तीन पदक मिलने पर हर भारतीय की तरह मुझे भी गवॆ है। अब पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को सिर-आंख पर बैठाया जाएगा। हर भारतीय की तरह मैं भी भीतर से गुरूर से भर जाऊंगा। मुझे भी नाज होगा अपने भारतीय होने पर। पर सामानांतर रूप से चलने वाली एक और लकीर भी पीड़ा देती रहेगी। वह है, खेल में मिली ताजातरीन उपलब्धियों पर श्रेय लेने की राजनीति की। राजनीति की दुनिया में तो खेल अब शुरु होगा और विषय होगा बीजिंग के मेडल। देखते रहिए, राजनीति के खिलाड़ी कब किस पर कैसा निशाना या पंच मार कर किसे घायल करते हैं और खुद को विजेता घोषित करते हैं। राजनीति का ओलंपिक मैदान तो अब सियासतदांन तय करेंगे कि उनमें से कौन अभिवन बिंद्रा या विजेन्द्र है। खैर.......... रहना तो यहीं हैं तो झेलना भी है इस गलीच राजनीति को।

सोमवार, 18 अगस्त 2008

मेडल के बहाने

ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा का गोल्ड और अब जितेंद्र, विजेंद्र और अखिल कुमार के कारण बॉक्सिंग को लेकर बढ़ी लोकप्रियता से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अब कम से कम देश में खेल के नीति बनाने वाले खेल को बढ़ावा देने के लिए कुछ खास करेंगे। हमारे देश से कई खिलाड़ी बीजिंग गए। कुछ आगे बढ़े लेकिन कड़ी टक्कर में वे पिछड़ गए। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने बेहतरीन प्रयास न किए हों, लेकिन खेल में आखिर सबसे ताकतवर को तो जीतना ही था। यह संयोग है कि शूटिंग और बॉक्सिंग में उल्लेखनीय प्रदशॆन करने वाले खिलाड़ी उस पंजाब और हरियाणा राज्यों से हैं जो अतीत में भाई थे। संयुक्त महापंजाब से विभाजित कर हरियाणा अलग राज्य बना था। यही वो दोनों राज्य हैं जो खाद्यान से देशभर का पेट भरते आए हैं। साफ है कि दोनों राज्यों के मेहनतकश नागरिक हर फील्ड में नाम कमाते आए हैं। चाहे वह सेना को सेवाएं देने का मामला हो या फिर देश-विदेश में इंजीनियरिंग, डाक्टरी आदि पेशे। यही वजह है कि पंजाब अब केवल पंजाब न होकर ग्लोबल पंजाब के नाम से पहचाना जाता है। हर मैदान में पंजाब और हरियाणा के लोगों ने अपने को साबित किया है। पंजाबियों को जहां क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्दू, युवराज सिंह, हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह आदि पर नाज है तो हरियाणा को कपिल देव, चेतन शमा, जोगिंद्र शमाॆ आदि पर नाज है। बीजिंग में भिवानी के छोरों के मुक्कों की आवाज देश में खेल के प्रति उदासीन रहने वालों के कानों में भी गूंजनी चाहिए, तभी जाकर भविष्य में कुछ और अभिनव पैदा होंगे।

रविवार, 17 अगस्त 2008

तुझे सब है पता .. है न माँ


मैं कभी बतलाता नहीं...

पर परीक्षाओं से डरता हूँ मैं माँ ...

यूं तो मैं दिखलाता नहीं ...

मार्क्स की परवाह करता हूँ मैं माँ ..

तुझे सब है पता ....

है न माँ

किताबों में ...यूं न छोडो मुझे..

पाठों के नाम भी न बतला पाऊँ माँ

वह भी तो ...इतने सारे हैं....

याद भी अब तो आ न पाएं माँ ...

क्या इतना गधा हूँ मैं माँ ..

क्या इतना गधा हूँ मैं माँ ..

जब भी कभी .इनविजिलेटर मुझे ..

जो गौर से ..आँखों से घूरता है माँ ...

मेरी नज़र ..ढूंढे कॉपी में ...

सोचूं यही कोई सवाल तो बन जायेगा.....

उनसे में ...यह कहता नहीं ..

बगल वाले से टापता हूँ मैं माँ

चेहरे पे ...आने देता नहीं...

दिल ही दिल में घबराता हूँ माँ

तुझे सब है पता .. है न माँ ..

तुझे सब है पता ..है न माँ ..

मैं कभी बतलाता नहीं...

पर परीक्षाओं से डरता हूँ मैं माँ ...

यूं तो मैं दिखलाता नहीं ...

अंकों की परवाह करता हूँ मैं माँ ..

तुझे सब है पता ....है न माँ

तुझे सब है पता ....है न माँ

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

कैसे बने कामयाब पति- कुछ नुस्खे



आज के दौर में हर शादीशुदा या गैरशादीशुदा इंसान जिस समस्या से जूझ रहा है वह है कामयाब पति कैसे बनें की जद्दोजहद-- कक्का जी ने सोफे पर पसरते हुए बयान दिया। कक्का जी का चेहरा भव्य है और पीआर करने में माहिर हैं, उनकी मूंछे यूपीए गठबंधन की तरह खिचडी हैं। नाक के बाल बीएसपी की तरह कभी समर्थन देते हैं, कभी खींच लेते हैं।
गुस्ताख हैरान रह गया। शादीशुदा तो खैर समझ में आता है कि परेशां होंगे लेकिन गैर शादीशुदा॥?यार वो भी कभी शादीशुदा होंगे कि नहीं-- कक्का जी ने बात साफ़ की। देखते नहीं कि कनाडा में बठे उड़नतश्तरी तक पत्नी से घबराते हैं। पत्नी होती ही घबराने वाली चीज़ है। कविता या कहानी में किसी स्त्री की जिक्र हो जाए, तो पत्नी एयर ले लेती है। कौन है? किस पर लिखा है इतना रोमांटिक ? हम पर तो कभी नहीं लिखा? अब आप जनाब देते रहे दुहाई-- तुमको मैं अपनी जान कहूँ या नील गगन का चाँद कहूँ।
गुस्ताख घबराया - यार कक्का कोई तो नुस्खा होगा कामयाब पति बनने का। कक्का जी फूले -सुनो बचवा हमारे हमारे पास इस बारे में अगाध नॉलेज है। गुस्ताख ने पूछा - पति बनने का? पर हमारे खयाल से आप भी बेलन नहीं तो कम-अज-कम बातों से पसली तो रोज़ाना तुड़वाते ही हैं। कक्का जी ने रजनीश को बहुत पढ़ा है।
उनकी बातचीत में सेक्स बहुत बार प्रयोग होता है। कुछ महिला विमर्श भी पढ़ रखा है। सेकेंड सेक्स भी पढ़ने दिया था। साइकोलजी पढ रखी है। कहा- तुन्हें अभिनय आना चाहिए वह भी बेदाग। रोने लगो तो राजेंद्र कुमार फेल हो जाना चाहिए। भावप्रवण अभिनय करो॥ राजकपूर की तरह.. लगे कि यह जो बंदा है सच्चा है और आरोप लगे तो अभी मैच फिक्सिंग में फंसे कपिल की तरह दहाड़ें मार कर रो पड़ेगा।
दूसरा, झूठ बालना आना चाहिए। पत्नी को बिला शक बॉस मानते हुए बहाने बनातर हमेशा तैयार रखों। बहाने भी एक दम फिट एन फाईन हों? यार आज तो लाईफ़ एँड डेथ का मामला था। इस टाइप का॥कक्का जी कुछ बोलने ही वाले थे कि भीतर से काकी ने आवाज़ लगाई..कक्का बाहर निकले तो कुछ और नुस्खें बताएं। हम भी इंतजार में हैं।

कहां हो बापू?

जाने कितने बरस पहले कह गए बापू, विकास को 'सबसे गरीब' की नजर से देखो, सबसे पहले गांव को सुधारो, हाशिये पर खडे आखिरी आदमी को मुख्यधारा में लाओ, संसाधनों का बांटवारा ऐसा करो, कि सबको बराबरी का अहसास हो, समाज में अपनी हिस्सेदारी का बोध हो, निहायत ही देशी अंदाज़ में समझाया बापू ने- जिनती कीमत वकील के काम की, उतनी ही कीमत नाई के काम की. लेकिन काहे को...ये ससुरे तो...
छोड़िए हम कौन होते हैं, इस बहस पर मुंहचोदी करने वाले, आपके पास टाइम भी तो नही, लेकिन जाने से पहले ऊपरवाले सीन को फिर से देखते जाईए कि बापू की बात न मानने का हस्र क्या होता है.
नेट सर्फिंग के दौरान कहीं से मिल गई थी ये तस्वीर, जो है भले ही सूडान की, इसमें नतीजा साफ दिखता है बापू की अनदेखी का. एक बच्चा मर रहा है- भूख से, बेचारा मर तो रहा था पैदा होने के बाद से ही, लेकिन इस वक्त उसका कंकाल ले रहा है आखिरी सांस. इसके ठीक पीछे ताक लगाए बैठा है चील- कि कब ये आदमी का बच्चा अपनी आखिरी सांस ले, और वो अपनी अंतड़ियों की ऐंठन शांत करें.जरा गौर करिए चील की इंसानियत पर, वो चाहे तो 'मर चुके से' बच्चे को एक ही झपट्टे में साफ कर दे, लेकिन वो आदमी की अनदेखी से मर रहे बच्चे का आखिरी सांस लेने तक इंतजार कर रहा है. कितना दर्दनाक आदर्श स्थापित कर रहा है ये चील!
इससे भी खौफनाक है उस फोटोग्राफर केविन कार्टर की हकीकत, जो इस सीन को अपने कैमरे में कैद तो कर लाए, लेकिन इसके बाद चैन की नींद नहीं सो पाए, अपने ईर्द गिर्द बुनी हुई आधुनिकता से उन्हें घिन होने लगी, विकास के महल उन्हें खोखले नजर आने लगे, वो अवसाद में चले गए, तीन महीने बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली!