कत्रिम लेकिन तेज विकास की रफ्तार से आसपास की दुनिया बदल रही है। जमीन के बल पर खड़ी बहुमंजिला इमारतें अब आसमान में नजर आती हैं। यह काम और कोई नहीं बल्कि मजदूर करता है। यह तबका आज भी जमीन पर रहता है, इससे जुड़ा है। दिनभर की ढुलाई और पसीने से तरबतर यह थका सा मजदूर किसी अधॆविकसित इमारत में शाम ढले लालटेन की बुझी सी रोशनी में अपनी थाली तैयार करता है। इस समय उसकी कल्पनाएं खीर, पूरी, सब्जी-दाल और चावल से सजती होंगी लेकिन वास्तव में थाली में एक अदद मिचॆ, हाथ से तोड़ा गया प्याज और मोटी रोटी होती है। वो इसे शौक से खाता है। दिनभर की कमाई के थोड़े से हिस्से से यदाकदा वह किसी भोजपुरी फिल्म का लुत्फ भी उठा लेता है। सिनेमा हाल से निकलने वाली रिक्शा और ठेलों की भीड़, आज के उन मल्टीपलेक्स, शॉपिंग मॉल से टक्कर तो लेती है, जिन्हें वास्तव में इन्होंने ही आसमान पर पहुंचाया है। वे पिजा या सिज्लर तो नहीं लेकिन ठेलों पर रसीली जलेबी का स्वाद लेकर अपने भीतर के रसबोध का भी अससास करवाते हैं। इधर, हम हैं कि मल्टीस्टोरी बिल्डिंग की छत से हमें नीचे की दुनिया बहुत छोटी नजर आती है। सब कीड़े प्रतीत होते हैं। जमीन तो दिखती है पर उसकी सच्चाई नहीं देख पाते। कुल मिलाकर हम असली भारत और उसको आधुनिक बना रहे असली भारतीयों की तरफ ध्यान ही नहीं देते। आदतन हमसब आसमान की ओर देखकर ही चलते हैं और ठोकर खाते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें