शनिवार, 1 नवंबर 2008

मेरी मुराद पूरी, तुम्हारे मंसूबे पूरे

चुनाव का सीजन शुरु होने को है। सीजन इस लिए कहा क्योंकि किसी व्यापारी की तरह राजनेता भी अपने बिजनेस को लेकर उम्मीद लगाते हैं कि इस बार फसल (वोट) अच्छी कटेगी क्योंकि उन्होंने दिन-रात एक कर कभी धिक्कार रैली तो कभी बदलाव रैली तो कभी विजय संकल्प रैली, विकास रैली आदि एतिहासिक रैलियां कर जो विरोधियों को अपनी मांद में घुसने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह उठता है कि रैलियां और उनको दिए जाने वाले नाम अथवा इन रैलियों में गला फाड़-फाड़ कर दोहराए जाने वाले नारे और संकल्पों का भीड़ पर क्या प्रभाव पड़ता है। जनता इन रैलियों को रैले की शक्ल इस उम्मीद से देती है शायद नेतागण उनके दुख महसूस करते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि सभी राजनेता संवेदनहीन नहीं हैं। कुछ वाकई में आम जनता के लिए सोचते भी होंगे। लेकिन, मौजूदा राजनीति का कड़वा सच यही है कि चुनाव के सीजन में रैलियों का असल मकसद अपने दल के अनुरूप माहौल तैयार करने का होता है। मुद्दे भी वही उठाए जाते हैं कि भोला मतदाता उनकी रौ में बह जाए। वह इस रौ में बहेगा तभी तो किसी को धिक्कारेगा या कोई संकल्प लेगा अथवा परिवतॆन की कसम खाएगा। यदि कसम खरी उतर गई तो उसकी जहां मुराद पूरी होगी वहीं राजनेताओं के मंसूबे भी पूरे हो जाएंगे।

शनिवार, 23 अगस्त 2008

आसमान में इमारतें और जमीन का सच

कत्रिम लेकिन तेज विकास की रफ्तार से आसपास की दुनिया बदल रही है। जमीन के बल पर खड़ी बहुमंजिला इमारतें अब आसमान में नजर आती हैं। यह काम और कोई नहीं बल्कि मजदूर करता है। यह तबका आज भी जमीन पर रहता है, इससे जुड़ा है। दिनभर की ढुलाई और पसीने से तरबतर यह थका सा मजदूर किसी अधॆविकसित इमारत में शाम ढले लालटेन की बुझी सी रोशनी में अपनी थाली तैयार करता है। इस समय उसकी कल्पनाएं खीर, पूरी, सब्जी-दाल और चावल से सजती होंगी लेकिन वास्तव में थाली में एक अदद मिचॆ, हाथ से तोड़ा गया प्याज और मोटी रोटी होती है। वो इसे शौक से खाता है। दिनभर की कमाई के थोड़े से हिस्से से यदाकदा वह किसी भोजपुरी फिल्म का लुत्फ भी उठा लेता है। सिनेमा हाल से निकलने वाली रिक्शा और ठेलों की भीड़, आज के उन मल्टीपलेक्स, शॉपिंग मॉल से टक्कर तो लेती है, जिन्हें वास्तव में इन्होंने ही आसमान पर पहुंचाया है। वे पिजा या सिज्लर तो नहीं लेकिन ठेलों पर रसीली जलेबी का स्वाद लेकर अपने भीतर के रसबोध का भी अससास करवाते हैं। इधर, हम हैं कि मल्टीस्टोरी बिल्डिंग की छत से हमें नीचे की दुनिया बहुत छोटी नजर आती है। सब कीड़े प्रतीत होते हैं। जमीन तो दिखती है पर उसकी सच्चाई नहीं देख पाते। कुल मिलाकर हम असली भारत और उसको आधुनिक बना रहे असली भारतीयों की तरफ ध्यान ही नहीं देते। आदतन हमसब आसमान की ओर देखकर ही चलते हैं और ठोकर खाते हैं।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

खेल तो अब होगा शुरू, राजनीति के खिलाड़ी हैं तैयार....

खेल के इतिहास में पहली बार तीन पदक मिलने पर हर भारतीय की तरह मुझे भी गवॆ है। अब पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को सिर-आंख पर बैठाया जाएगा। हर भारतीय की तरह मैं भी भीतर से गुरूर से भर जाऊंगा। मुझे भी नाज होगा अपने भारतीय होने पर। पर सामानांतर रूप से चलने वाली एक और लकीर भी पीड़ा देती रहेगी। वह है, खेल में मिली ताजातरीन उपलब्धियों पर श्रेय लेने की राजनीति की। राजनीति की दुनिया में तो खेल अब शुरु होगा और विषय होगा बीजिंग के मेडल। देखते रहिए, राजनीति के खिलाड़ी कब किस पर कैसा निशाना या पंच मार कर किसे घायल करते हैं और खुद को विजेता घोषित करते हैं। राजनीति का ओलंपिक मैदान तो अब सियासतदांन तय करेंगे कि उनमें से कौन अभिवन बिंद्रा या विजेन्द्र है। खैर.......... रहना तो यहीं हैं तो झेलना भी है इस गलीच राजनीति को।

सोमवार, 18 अगस्त 2008

मेडल के बहाने

ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा का गोल्ड और अब जितेंद्र, विजेंद्र और अखिल कुमार के कारण बॉक्सिंग को लेकर बढ़ी लोकप्रियता से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अब कम से कम देश में खेल के नीति बनाने वाले खेल को बढ़ावा देने के लिए कुछ खास करेंगे। हमारे देश से कई खिलाड़ी बीजिंग गए। कुछ आगे बढ़े लेकिन कड़ी टक्कर में वे पिछड़ गए। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने बेहतरीन प्रयास न किए हों, लेकिन खेल में आखिर सबसे ताकतवर को तो जीतना ही था। यह संयोग है कि शूटिंग और बॉक्सिंग में उल्लेखनीय प्रदशॆन करने वाले खिलाड़ी उस पंजाब और हरियाणा राज्यों से हैं जो अतीत में भाई थे। संयुक्त महापंजाब से विभाजित कर हरियाणा अलग राज्य बना था। यही वो दोनों राज्य हैं जो खाद्यान से देशभर का पेट भरते आए हैं। साफ है कि दोनों राज्यों के मेहनतकश नागरिक हर फील्ड में नाम कमाते आए हैं। चाहे वह सेना को सेवाएं देने का मामला हो या फिर देश-विदेश में इंजीनियरिंग, डाक्टरी आदि पेशे। यही वजह है कि पंजाब अब केवल पंजाब न होकर ग्लोबल पंजाब के नाम से पहचाना जाता है। हर मैदान में पंजाब और हरियाणा के लोगों ने अपने को साबित किया है। पंजाबियों को जहां क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्दू, युवराज सिंह, हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह आदि पर नाज है तो हरियाणा को कपिल देव, चेतन शमा, जोगिंद्र शमाॆ आदि पर नाज है। बीजिंग में भिवानी के छोरों के मुक्कों की आवाज देश में खेल के प्रति उदासीन रहने वालों के कानों में भी गूंजनी चाहिए, तभी जाकर भविष्य में कुछ और अभिनव पैदा होंगे।

रविवार, 17 अगस्त 2008

तुझे सब है पता .. है न माँ


मैं कभी बतलाता नहीं...

पर परीक्षाओं से डरता हूँ मैं माँ ...

यूं तो मैं दिखलाता नहीं ...

मार्क्स की परवाह करता हूँ मैं माँ ..

तुझे सब है पता ....

है न माँ

किताबों में ...यूं न छोडो मुझे..

पाठों के नाम भी न बतला पाऊँ माँ

वह भी तो ...इतने सारे हैं....

याद भी अब तो आ न पाएं माँ ...

क्या इतना गधा हूँ मैं माँ ..

क्या इतना गधा हूँ मैं माँ ..

जब भी कभी .इनविजिलेटर मुझे ..

जो गौर से ..आँखों से घूरता है माँ ...

मेरी नज़र ..ढूंढे कॉपी में ...

सोचूं यही कोई सवाल तो बन जायेगा.....

उनसे में ...यह कहता नहीं ..

बगल वाले से टापता हूँ मैं माँ

चेहरे पे ...आने देता नहीं...

दिल ही दिल में घबराता हूँ माँ

तुझे सब है पता .. है न माँ ..

तुझे सब है पता ..है न माँ ..

मैं कभी बतलाता नहीं...

पर परीक्षाओं से डरता हूँ मैं माँ ...

यूं तो मैं दिखलाता नहीं ...

अंकों की परवाह करता हूँ मैं माँ ..

तुझे सब है पता ....है न माँ

तुझे सब है पता ....है न माँ

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

कैसे बने कामयाब पति- कुछ नुस्खे



आज के दौर में हर शादीशुदा या गैरशादीशुदा इंसान जिस समस्या से जूझ रहा है वह है कामयाब पति कैसे बनें की जद्दोजहद-- कक्का जी ने सोफे पर पसरते हुए बयान दिया। कक्का जी का चेहरा भव्य है और पीआर करने में माहिर हैं, उनकी मूंछे यूपीए गठबंधन की तरह खिचडी हैं। नाक के बाल बीएसपी की तरह कभी समर्थन देते हैं, कभी खींच लेते हैं।
गुस्ताख हैरान रह गया। शादीशुदा तो खैर समझ में आता है कि परेशां होंगे लेकिन गैर शादीशुदा॥?यार वो भी कभी शादीशुदा होंगे कि नहीं-- कक्का जी ने बात साफ़ की। देखते नहीं कि कनाडा में बठे उड़नतश्तरी तक पत्नी से घबराते हैं। पत्नी होती ही घबराने वाली चीज़ है। कविता या कहानी में किसी स्त्री की जिक्र हो जाए, तो पत्नी एयर ले लेती है। कौन है? किस पर लिखा है इतना रोमांटिक ? हम पर तो कभी नहीं लिखा? अब आप जनाब देते रहे दुहाई-- तुमको मैं अपनी जान कहूँ या नील गगन का चाँद कहूँ।
गुस्ताख घबराया - यार कक्का कोई तो नुस्खा होगा कामयाब पति बनने का। कक्का जी फूले -सुनो बचवा हमारे हमारे पास इस बारे में अगाध नॉलेज है। गुस्ताख ने पूछा - पति बनने का? पर हमारे खयाल से आप भी बेलन नहीं तो कम-अज-कम बातों से पसली तो रोज़ाना तुड़वाते ही हैं। कक्का जी ने रजनीश को बहुत पढ़ा है।
उनकी बातचीत में सेक्स बहुत बार प्रयोग होता है। कुछ महिला विमर्श भी पढ़ रखा है। सेकेंड सेक्स भी पढ़ने दिया था। साइकोलजी पढ रखी है। कहा- तुन्हें अभिनय आना चाहिए वह भी बेदाग। रोने लगो तो राजेंद्र कुमार फेल हो जाना चाहिए। भावप्रवण अभिनय करो॥ राजकपूर की तरह.. लगे कि यह जो बंदा है सच्चा है और आरोप लगे तो अभी मैच फिक्सिंग में फंसे कपिल की तरह दहाड़ें मार कर रो पड़ेगा।
दूसरा, झूठ बालना आना चाहिए। पत्नी को बिला शक बॉस मानते हुए बहाने बनातर हमेशा तैयार रखों। बहाने भी एक दम फिट एन फाईन हों? यार आज तो लाईफ़ एँड डेथ का मामला था। इस टाइप का॥कक्का जी कुछ बोलने ही वाले थे कि भीतर से काकी ने आवाज़ लगाई..कक्का बाहर निकले तो कुछ और नुस्खें बताएं। हम भी इंतजार में हैं।

कहां हो बापू?

जाने कितने बरस पहले कह गए बापू, विकास को 'सबसे गरीब' की नजर से देखो, सबसे पहले गांव को सुधारो, हाशिये पर खडे आखिरी आदमी को मुख्यधारा में लाओ, संसाधनों का बांटवारा ऐसा करो, कि सबको बराबरी का अहसास हो, समाज में अपनी हिस्सेदारी का बोध हो, निहायत ही देशी अंदाज़ में समझाया बापू ने- जिनती कीमत वकील के काम की, उतनी ही कीमत नाई के काम की. लेकिन काहे को...ये ससुरे तो...
छोड़िए हम कौन होते हैं, इस बहस पर मुंहचोदी करने वाले, आपके पास टाइम भी तो नही, लेकिन जाने से पहले ऊपरवाले सीन को फिर से देखते जाईए कि बापू की बात न मानने का हस्र क्या होता है.
नेट सर्फिंग के दौरान कहीं से मिल गई थी ये तस्वीर, जो है भले ही सूडान की, इसमें नतीजा साफ दिखता है बापू की अनदेखी का. एक बच्चा मर रहा है- भूख से, बेचारा मर तो रहा था पैदा होने के बाद से ही, लेकिन इस वक्त उसका कंकाल ले रहा है आखिरी सांस. इसके ठीक पीछे ताक लगाए बैठा है चील- कि कब ये आदमी का बच्चा अपनी आखिरी सांस ले, और वो अपनी अंतड़ियों की ऐंठन शांत करें.जरा गौर करिए चील की इंसानियत पर, वो चाहे तो 'मर चुके से' बच्चे को एक ही झपट्टे में साफ कर दे, लेकिन वो आदमी की अनदेखी से मर रहे बच्चे का आखिरी सांस लेने तक इंतजार कर रहा है. कितना दर्दनाक आदर्श स्थापित कर रहा है ये चील!
इससे भी खौफनाक है उस फोटोग्राफर केविन कार्टर की हकीकत, जो इस सीन को अपने कैमरे में कैद तो कर लाए, लेकिन इसके बाद चैन की नींद नहीं सो पाए, अपने ईर्द गिर्द बुनी हुई आधुनिकता से उन्हें घिन होने लगी, विकास के महल उन्हें खोखले नजर आने लगे, वो अवसाद में चले गए, तीन महीने बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली!

बुधवार, 18 जून 2008

मीडिया बना स्वयम्भू ठेकेदार

अब वह वक्त आ गया है जब किसी अपराध के लिए पीड़ित लोग पुलिस और सीबीआई की जांच के बजाय मांग करेंगे कि मामला मीडिया ख़ास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सुपुर्द कर दिया जाए। इसके दो लाभ होंगे। पहले तो टीवी चैनल जम कर ट्रायल कम इन्कुआरी करेंगे। आउट पुट और इन पुट दोनों का काम बढेगा, काम बढेगा तो उन्हें भारी भरकम लिफाफा हर माह पकडा देने वाला मालिक बड़ा खुश होगा। एंकर को तब परदे पर ज्यादा चीखना-चिल्लाना पड़ेगा। अभी तक किसी अपराध के लिए रिपोर्टिंग करने में कई फिल्ड संवाददाताओं को घटना स्थल, सीबीआई दफ्तर, पुलिस प्रमुख ऑफिस या अस्पताल आदि-आदि ठिकानो पर खड़ा होना पड़ता है। नई व्यवस्था में इक फील्ड रिपोर्टर की कमी हो सकेगी, तब सीबीआई मुख्यालाय या पुलिस ऑफिस के सामने संवाददाताओं की जरूरत नही होगी। जांच का काम जब स्टूडियो में हे संपन्न होगा तो फिर अतरिक्त संवाददाता की क्या जरूरत?
अभी channels कई प्रकार के मामलो मे बातचीत के लिए कुछ ख़ास लोगो को बुलाते हैं। जिन्हें वे एक्सपर्ट कहते हैं। वे खूब बोलते हैं। ऐसे लोगो को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भाषा में "जुबान छेत्तू " कहा जाता है, यानी जुबान पीटने वाले। वे अधिकतर चेनल के एंकर से सहमत होते सुने औरदेखे जाते हैं। अगर कोई जुबान छेत्तू चेनल और एंकर की तयशुदा पॉलिसी से ज्यादा ही इधर-उधर होता है तो उसका नाम पैनल से हटा दिया जाता है। इस लिए कोई बिरला ही जुबान छेतू दाएं-बाएँ होता है। बंदी-बंधाई लीक पर बोलने का मतलब होता है कि पत्रम-पुष्पम से इक अदद "ठीक-ठाक" कवालिटी की स्कॉच की इक बोतल खरीदी जा सकती है।
अपराध की मीडिया ट्रायल का इक बहुत बड़ा लाभ है जो अपने महान अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री को भी भा जायेगा। तब अदालतों की जरूरत नही होगी। मीडिया ट्रायल कर लेगा और फैसला भी दे देगा। अदालतों मे जो करोडो रुपया रोजाना खर्च होता है वो देश हित मे बचेगा। फ़ैसला मीडिया दो प्रकार से तय करेगा। इक अपने स्टूडियो मे अनगिनत शेखर सुमंनो, नवजोत सिधुओं, मंदिराओं को जज के रूप मे बैठायेगा। लेकिन मामला तय करेगी जनता जो पक्ष-विपक्ष में चेनल को एस एम् एस भेजेगी। नोट करिये मोबाइल कंपनियों को कितना लाभ होगा!
लेकिन इक दिक्कत है, जनता अभी राज्य पुलिस मे अविश्वास जता कर सीबीआई से जांच की मांग करती है। सीबीआई तो इक है। लेकिन चेनल तो टोकरी भर हो गए हैं। तब समस्या होगी कि ट्रायल कौन सा चैनल करे? इसके लिए सुझाव पेश है कि मंदी मे नीलामी हो। जांच की मांग करने वाला पक्ष बोली लगाये, चॅनल अपने biknay की कीमत (रिज़र्व) तय करे। बोली ऊपर नीचे होते-होते कही न कही तय हो ही जायेगी।
मंदी मे चेनलों के स्तर (टी आर पी तक) होंगे। बड़े तेज़ और बेहद चालू चैनल से ट्रायल करवाने के लिए अमीर पार्टियाँ बोली देंगी। फिर आयेंगे मध्यम वर्ग के लिए मध्यं गति दशा वाले कम कीमत वाले चैनल। वे चैनल जो टीवी केबल से घरों तक पहुचते हैं। यह बेहद सस्ता होगा, ट्रायल और फ़ैसला भी उसी स्तर के अनुसार होगा। झुग्गी-झोपडी, स्लम वालो को मीडिया ट्रायल सुविधा का लाभ नही मिल सकेगा। उसके लिए रोहतक पुलिस के दो रंगरूट ही काफ़ी होंगे।
झुग्गी वालों को भे इक दिन चैनल- ट्रायल की सुविधा मिलेगी यह तब होगा जब कोई राजनितिक दल सत्ता हासिल करने के लिए कोई अन्य मुद्दा हाथ मे न होने पर इसका वायेदा जनता से कर देगा। अगर सत्ता मे आ गया तो पहले पार्टी मे कमेटी, फिर मंत्रिमंडल में सब कमेटी बना दी जायेगी। वर्षों तक संसद मे तय होगा की पास करे या फिर प्रवर समिति के ठंडे बस्ते में रख दें। इसलिए फिलहाल तो झोपड़-पट्टी वासिओं के लिए पुलिस ही विकल्प होगी।
ट्रायल की इस प्रस्तावित योजना में हम प्रिंट मीडिया को भूले जा रहे हैं। प्रिंट मीडिया भे मंदी माय इक हिस्सा होगा। उसकी दूकान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से छोटी होगी। लेकिन मंत्री से संत्री तक प्रिंट धारीओं की महेत्व समझते हैं। माना जाता है कि प्रिंट जल्दी ही सस्ते में फिक्स हो जाता है। प्रिंट की दहशत कम नही हुई है पर उसके रेट कम है। प्रिंट में अभी बहुतेरे एइसे "सिरफिरे " मोजूद हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के ऐसा ट्रायल शुरू कर देंगे। वे समाज-सेवा या अधिकारों के प्रति जागरूकता का लेबल चस्पा कर ऐसा करते हैं। इस पुनीत समाज सेवा के पीछे जिला या तहसील स्तर पर उनकी पुलिस कप्तान, जिलाधिकारी आदि से कोई पुरानी लाग-डाट भी हो सकती है। पर पीड़ित या बचाव पक्ष को इससे क्या लेना-देना! प्रिंट को हर मामलों माय इलेक्ट्रॉनिक की अपेक्षा किसी भी घटना या हादसों पर "फ्री एक्सपर्ट " मिल जाते हैं, क्यो कि वो "छपास रोगी " जो होते हैं।

शनिवार, 7 जून 2008

जीवन शैली के पुरातन अंदाज़ पर नया नजरिया

अमर उजाला चंडीगढ़ के युवा सम्पादक श्री प्रमोद भारद्वाज ने पत्रकारिता जगत की गंभीर और बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी संवेदनशीलता को साझा करने के लिये पीछे लौटें नाम से एक गंभीर ब्लॉग का प्रारंभ किया है।श्री प्रमोद जी के अनुसार इस ब्लॉग में तेज गाम जिंदगी के उन पहलुओं पर गंभीर चिंतन होगा, जिनकी असल जिंदगी में कोई ज़रूरत ही नही है।वे बताएँगे के जिंदगी दौड़ते हुए आगे जाने में है या पीछे लौटने में।

शुक्रवार, 23 मई 2008

कब आएगा शेर..... !

दैनिक जागरण के बहु प्रतीक्षित मोहाली एडिशन के शुरू होने की ख़बरें फ़िर से फैलनी शुरू हो गई हैं ताज़ा ख़बर है की मोहाली एडिशन इसी साल के अक्टूबर-नवम्बर में छापने की चर्चा है, जिसका आगाज़ करने वाली टीम में संस्थान के ही तीन वरिष्ट लोगो को लुधियाना से चंडीगढ़ भेजा गया है। ये लोग हैं, सुशील खन्ना (डी एन ई ), चन्द्रशेखर (चीफ सब एडिटर) और गौरव तंवर (सीनियर सब एडिटर)। सूचनाये हैं की जल्द ही सात-आठ और लोग चंडीगढ़ डेस्क पर विराजमान हो जायेंगे। जो भे होगा उसकी उसकी ताज़ी जानकारी ब्लॉग चास्केबाजों को मिलती रहेगी। आप भे इस चसके मे आहूति डालो। वैसे भी यह इस लिए ज़रूरी हे की दैनिक जागरण का मोहाली एडिशन अब तक शेर आ गया वाली कहावत पर ही टिका हुआ है।

रविवार, 18 मई 2008

समय रहेगा हाथ मे

मेरे साथ है
हादसों से भरा पूरा विश्व
हादसों का ज़िक्र नही
भय है मेरा लिखा न बन जाए
अखबारों का प्रष्ठ !
यों भी समकालीनता हादसों से परिभाषित नही होती बन्धु।
समय के झुलसे-अनसुलझे रहस्यों
का ब्योरा, /शताब्दियों मे करना दर्ज
महज होगा, / इतिहास का कोरा-दस्तावेज़।
समय रहेगा हाथ मे तो
हादसे होंगे तंग
समकालीनता का दावों का
कही तो होगा ढंग!
समय रहेगा हाथ मे तो
हादसे होंगे तंग
के-
समकालीन हादसों को
हाशिये मे करेगी बंद।
पर जब-
समय रहेगा हाथ मे।


-रचना: डाक्टर मीरा गौतम,
प्रोफेसर, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी
(हरियाणा)

शनिवार, 17 मई 2008

खुश नही रॉक गार्डन के निर्माता

बीच-बीच मे उठने वाली बात इक बार फिर सुर्खियों में है। विश्व प्रसिद्ध चंडीगढ़ के रॉक गार्डन के निर्माता नेक चंद को मलाल है की वो इक और रॉक गार्डन नही बना पाये। अपनी अनूठी परिकल्पना और सर्जन के धनि नेक चंद ने कबाड़ या फिर कूड़े मे फेकी जाने वाली वस्तुओं को खूबसूरत आकार देकर दुनिया मे नाम कमाया लेकिन अफसरशाही की उपेक्षा उनके गले से नीचे नही उतर रही है। वे अभी तक चंडीगढ़ प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये से आह़त महसूस कर रहे थे की अब नई दिल्ली और केरल मे रॉक गार्डन के निर्माण को लेकरवहा के प्रशासनों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने इस बड़े कलाकार को चोट पहुंचा दी है। वर्ष २००० मे दिल्ली देवेल्पोमेंट अथॉरिटी ने २००० एकड़ इलाके मे तो दूसरी तरफ़ इसी तुरह की मदद केरल सरकार ने वर्ष १९९६ मे उनसे मांगी थी। उस समय उमीदे थी कि चूकि पर्यटन उद्योग लगातार फल फूल रहा है । इसमे निजी क्षेत्र के अलावा सरकारें भी दिलचस्पी ले रही हैं तो जल्द ही दुनियाभर के पर्यटकों को सिर्फ़ चंडीगढ़ ही नही बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और दक्षिण भारत में भी इस अनूठे कला संसार के दर्शन हो जायेंगे। लेकिन हमेशा कि तरह यहाँ भी लाल फीताशाही आड़े आई और बुजुर्ग नेकचंद कलाकार दिल टूट गया है। पिछले दिनों लम्बी बीमारी से उठे नेकचंद के लिए इस तरह की सरकारी उपेक्षाएं कोई नई बात नही है, सवाल यह उठता है कि क्या नेकचंद ने अपनी कला के बल पर चंडीगढ़ को रॉक गार्डन जैसी नायाब धरोहर देकर विश्व के पर्यटन नक्शे पर लाकर कोई गुनाह किया है?