रविवार, 18 मई 2008

समय रहेगा हाथ मे

मेरे साथ है
हादसों से भरा पूरा विश्व
हादसों का ज़िक्र नही
भय है मेरा लिखा न बन जाए
अखबारों का प्रष्ठ !
यों भी समकालीनता हादसों से परिभाषित नही होती बन्धु।
समय के झुलसे-अनसुलझे रहस्यों
का ब्योरा, /शताब्दियों मे करना दर्ज
महज होगा, / इतिहास का कोरा-दस्तावेज़।
समय रहेगा हाथ मे तो
हादसे होंगे तंग
समकालीनता का दावों का
कही तो होगा ढंग!
समय रहेगा हाथ मे तो
हादसे होंगे तंग
के-
समकालीन हादसों को
हाशिये मे करेगी बंद।
पर जब-
समय रहेगा हाथ मे।


-रचना: डाक्टर मीरा गौतम,
प्रोफेसर, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी
(हरियाणा)

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