बुधवार, 27 जनवरी 2021


फ्लैशबैक की रोड पर एक सफर

  


ऋषिकेश का प्रोग्राम अचानक बना। तैयारी भी हुई उसी तरह झटपट। चूंकि सर्दी वाले दिसंबर (2020) का महीना था तो ऋषिकेश इलाके में अगले कुछ दिनों के मौसम का अनुमान गूगल बाबा के आशीर्वाद से पता कर उसी हिसाब से कपड़े भी पैक कर लिए। मन में सबसे बड़ी उत्सुकता यह थी कि कोरोनाकाल में लंबे समय तक घर में रहने के बाद पहली बार कहीं बाहर निकलना हो रहा था लेकिन, जहन में खुद को कोरोना से बचाए रखने की चुनौती भी थी।
बहरहाल, इस टूर के लिए सुबह-सुबह निकलना था तो मौजूदा मौसम के दौरान सफर में कोहरे की आशंका ने भी सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी फेर में अचानक बचपन में स्कूल की तरफ से ऋषिकेश की पिकनिक की स्मृतियां भी किसी कोहरे भरे धुंधलके में हल्की-हल्की नज़र आने लगीं। 
पक्की तरह से याद नही पर शायद मैं चौथी या पांचवी क्लास में पड़ते हुए ऐसी ही सर्दी वाले दिनों में पहली बार ऋषिकेश गया था। एक दम से जेहन में खुद को स्कूली ड्रेस में क्लासमेट्स के साथ ऋषिकेश की मुनि की रेती पर गंगा मैया के किनारे बैठे पाया। ..और हाँ, दूर से लछ्मण झूले का चित्र भी खिंच गया। स्मृति में खो जाने पर तमाम दूसरे चित्र भी उभर आए। चेहरे पर असली मुस्कुराहट तो स्कूली पिकनिक के उस क्रेज को याद कर आ गई कि, स्कूल तो गया था पर पहली बार बिना भारी बैग उठाए, क्लास से भी छुटकारा तो टीचर की तरेरती आंखों से भी निजात मिल गई थी। दूसरा क्रेज़ तो टिफ़िन में ही भरा हुआ था, जिसे मां ने सुबह ही तैयार कर कुछ हिदायतों के साथ मुझे और मेरे बैग को सर्दी के हिसाब से पैक कर दिया था कि कब क्या खाना है, क्या करना है। मुझे आज भी याद है कि तब टिफिन में आलू की सब्जी, पूरी और अचार, वॉटर बॉटल, ड्राईफ्रूट के नाम पर मूंगफली, टाइम पास के लिए पार्ले जी के बिस्कुट के पैकेट, टॉफियां, एक मिल्क बॉटल, संतरे, सेब और केले ही थे। उस दौर के स्कूल टिफिन आज की तरह पास्ता, बैंबिनो, पिज्जा या फ्रोजन फूड से भरे नहीं होते थे। उस दौर के टिफिन का अलग ही देसीऔर घरेलू स्वाद हुआ करता था। मुझे आज भी याद है कि उस दिन में मां के नींद से उठाने से पहले ही न केवल जाग गया था बल्कि बिना किसी नानुकुर के नहां भी लिया था। यह भी याद है तब मां ने मुझे तब एक की जगह दो स्वेटर, कोट, पैंट और यहां तक कि डबल जोड़ी जुराब तक पहनाई थी।
बहरहाल, तब और आज दिसंबर 2020 में ऋषिकेश की यात्रा में समानता केवल यही थी कि इस बार भी न केवल मां की हिदायतें बदस्तूर बरकरार थी बल्कि माँ खुद भी हरिद्वार तक साथ जा रही थीं। 
पूरे रास्ते मेरे दिमाग मे यही बात घूमती रही कि आज इतने साल बाद भी ऋषिकेश क्या वैसा ही होगा जिसके धुंधले चित्र अवचेतन में रचे-बसे हैं!! या क्या ऋषिकेश का मूल स्वरूप भी मौजूदा आधुनिक युग में विकास की अंधी और कृत्रिम दौड़ में पूरी तरह बदलते हुए कहीं खो गया होगा।

अपनी इस आशंका को लिए उधेड़बुन करता हुआ मैंने चंडीगढ़ से सफर शुरु कर दिया। मेरे साथ मां के अलावा मेरे के दोस्त कुलदीप भी थे। ऋषिकेश को लेकर मेरी यह आशंका उस समय और बढ़ गई जब मेरी गाड़ी चंडीगढ़ से देहरादून के लिए बने नए हाई स्पीड हाईवे पर सरपट दौड़ने लगी। इसका कारण यह था कि इस रूट पर पहले में यमुनानगर (हरियाणा) व सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) तक आता-जाता था जो इस बार इस हाईवे नुमा बाईपास में कहीं पीछे छूट गए। यह वही सहारनपुर है जहां से मैं बचपन मे उत्सुक मन लिए पहली बार ऋषिकेश गया था। खैर...नॉन स्टॉप हाईवे की स्पीड की तरह जेहन में कई विचार आये तो आज के ऋषिकेश की पवित्र नगरी को छूने की उत्सुकता भी परवान लेती चली गयी। 

 

                                     👆 (Panchkula-Dehradoon Highway)👆

 सहारनपुर को बाईपास कर कुछ दूरी पर भावनात्मक संबंधों वाले छोटे से कब्बे गागलहेड़ी की तरफ डायवर्सन दिखा तो मन को बहुत खुशी हुई। यह जंक्शन वास्तव में मेरी भावनाओं से जुड़ा है। यहां से एक तरफ मेरे नाना के देहरादून की तरफ रास्ता जाता है तो दूसरा मेरी ससुराल रुड़की की तरफ के लिए भी शॉर्टकट है। मन में अतीत की कुछ यादें लिए मैं आगे बढ़ा तो पता चला कि यह डायवर्सन तो छुटमलपुर की जगह मुजफ्फरनगर की तरफ सड़क से लिंक है। मै थोड़ा चकराया और पूछते-पूछते गागलहेड़ी से पहले भगवानपुर को जाने वाली रोड पर आ गया। इस जगह पहुंचते ही मां ने बताया कि यहां के उबले सिंघघाड़े बहुत मशहूर हैं और जब भी हम तेरे नाना के पास देहरादून जाते थे तो खूब सारे सिंघाड़े खरीद लेते थे।

मै उस समय माँ की इच्छा को शायद इस लिए नही समझ पाया कि आगे कोहरा बढ़ने से पहले हरिद्वार तक पहुचने की जल्दी थी। कुछ ही देर में मै उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड की सीमा पर पहुच गया। यहां चेकिंग चल रही थी। मेरे साथ मौजूद कुलदीप ने बताया कि महाकुम्भ की तैयारी चल रही है। ये सुनते ही कार में पीछे बैठी माँ ने महाकुम्भ के आयोजन और इसके पौराणिक महत्व पर विस्तार से बताया। इस महत्वपूर्ण जानकारियों को सुनते-सुनते हम भगवानपुर पहुंच गए।
भगवानपुर भी एक तरह से इस इलाके का जंक्शन पॉइंट है तो यहां भीड़ होना भी स्वाभाविक था। इन दिनों इस रोड पर भी रुड़की तक हाईवे चौड़ा हो रहा है और फ्लाईओवर तो कस्बे के बीच ही आ चुका तो इस कारण यहां से निकलने में देरी लगी। तब एहसास हुआ की पुराने दौर में एक जगह से दूसरी जगह जाने में किस तरह कीमती घण्टे खराब होते होंगे। इस लिए खुद को आज के दौर वाले नॉन स्टॉप हाईवे और तेज स्पीड वाले इंटरनेट युग में पाकर खुशनसीब सा भी लगा। बातों-बातों में मैं रुड़की की तरफ जाने की बजाए मशहूर धार्मिक स्थल पिरान कलियर शरीफ़ के पास से गुजरने वाली लिंक रोड पर पहुंच गया। ये सिंगल रोड था पर रुड़की रोड पर चल रहे रोड के काम को देखते हुए सही और कम भीड़ वाला था। इस तरह मैं हरिद्वार के आउटर पर पहुंच गया। इस पूरी सड़क पर मुझे एक बात अच्छी यह लगी कि मोटरसाइकिल या स्कूटर चला रहे लोगो ने हेलमेट पहने हुए थे। सुकून मिला कि जीवन की कीमत को सड़कों पर संजीदगी से लिया जाने लगा है। अलबत्ता दुख इस बात का जरूर हुआ कि कोरोना से चल रही जंग को लोग अब गंभीरता से नही ले रहे हैं बल्कि यहां के लोगों की डिक्शनरी में जैसे सोशल डिस्टेंसिंग तो जैसे कोई शब्द ही नहीं है। 
बहरहाल, हरिद्वार पहुचते ही मैंने दोबारा गूगल बाबा के चरण पकड़ लिए और गूगल मैप के सहारे आगे बढ़ता रहा लेकिन, कुछ देर बाद लगा कि गूगल बाबा हरिद्वार में कुम्भ की तैयारियों को लेकर बन रहे फ़्लाईओवर और सड़कों के मकड़जाल में उलझ से गए हैं। फिर एक पक्के भारतीय नागरिक की तरह परंपरागत जुगाड़ लगाया और पहुंच गए चौक पर एक पनवाड़ी की छत्रछाया में। उनसे गन्तव्य का पता किया। माँ को एडजस्ट किया, उनका सामान रखा और चाय के दौरान उनकी हिदयातों का लंबा लैक्चर की घुट्टी लेकर मैं और कुलदीप ऋषिकेश की तरफ निकल गए। 
 
 (👆Visual shot of Ganga river Rishikesh) 
 
ऋषिकेश की हरिद्वार से दूरी कोई लगभग 28 किलोमीटर होगीं लेकिन, लगातार गहरी होती शाम और पूरे रास्ते मे सड़क पर डायवर्सन और उसपर भारी ट्रैफिक के कारण कोई 2 घण्टे में हम ऋषिकेश के मशहूर नटराज चौक पहुंच गए। इस चौराहे पर सड़क किनारे लगे साइन बोर्डों ने मेरे घुमक्कड़ मन को बहुत ज्यादा लालायित कर दिया। एक तरफ हरिद्वार का रास्ता, जिससे हम आये थे, दूसरी तरफ देहरादून, खूबसूरत धनोल्टी और मसूरी तो तीसरी तरफ देवप्रायग व बद्रीनाथ तो चौथा ऋषिकेश शहर को रास्ता जा रहा था। हमने अर्जुन के लक्ष्य की तरह सीधे ऋषिकेश की धरती को चूम लिया। 
 
(👆Voice-over at Natraj Chowk-Rishikesh)
 
चूंकि रात के कोई साढ़े नौ बज चुके थे और पहाड़ों में जैसे यह वक्त आधी रात सा लगता है तो हमने सबसे पहले नटराज चौक पर एक रेस्टोरेंट से खाना पैक करवाया और होटल पहुंच गए। इस होटल की बुकिंग यहीं रहने वाले युवा व उर्जावान आशीष लखेड़ा ने की हुई थी। हमने खाना खाया और अगले दिन की प्लानिंग करते हुए सो गए।

अब अगली क़िस्त में बचपन में देखे ऋषिकेश बनाम आज के दौर के ऋषिकेश की अगली कड़ी जल्द होगी सामने.......
 
 
 

 

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2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Excellent! very enjoyable, waiting for next write up.

kare kare kagad ने कहा…

बढ़िया।