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सोमवार, 18 अगस्त 2008
मेडल के बहाने
ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा का गोल्ड और अब जितेंद्र, विजेंद्र और अखिल कुमार के कारण बॉक्सिंग को लेकर बढ़ी लोकप्रियता से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अब कम से कम देश में खेल के नीति बनाने वाले खेल को बढ़ावा देने के लिए कुछ खास करेंगे। हमारे देश से कई खिलाड़ी बीजिंग गए। कुछ आगे बढ़े लेकिन कड़ी टक्कर में वे पिछड़ गए। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने बेहतरीन प्रयास न किए हों, लेकिन खेल में आखिर सबसे ताकतवर को तो जीतना ही था। यह संयोग है कि शूटिंग और बॉक्सिंग में उल्लेखनीय प्रदशॆन करने वाले खिलाड़ी उस पंजाब और हरियाणा राज्यों से हैं जो अतीत में भाई थे। संयुक्त महापंजाब से विभाजित कर हरियाणा अलग राज्य बना था। यही वो दोनों राज्य हैं जो खाद्यान से देशभर का पेट भरते आए हैं। साफ है कि दोनों राज्यों के मेहनतकश नागरिक हर फील्ड में नाम कमाते आए हैं। चाहे वह सेना को सेवाएं देने का मामला हो या फिर देश-विदेश में इंजीनियरिंग, डाक्टरी आदि पेशे। यही वजह है कि पंजाब अब केवल पंजाब न होकर ग्लोबल पंजाब के नाम से पहचाना जाता है। हर मैदान में पंजाब और हरियाणा के लोगों ने अपने को साबित किया है। पंजाबियों को जहां क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्दू, युवराज सिंह, हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह आदि पर नाज है तो हरियाणा को कपिल देव, चेतन शमा, जोगिंद्र शमाॆ आदि पर नाज है। बीजिंग में भिवानी के छोरों के मुक्कों की आवाज देश में खेल के प्रति उदासीन रहने वालों के कानों में भी गूंजनी चाहिए, तभी जाकर भविष्य में कुछ और अभिनव पैदा होंगे।
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1 टिप्पणी:
बढ़िया आलेख..
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